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मंगलवार, 19 जून 2012

रोटी और संसद














रोटी और संसद

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है।
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है।
वह रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ –
‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’
मेरे देश की संसद मौन है।

हिन्दी साहित्य में धूमिल के नाम से प्रसिद्ध कवि सुदामा पाण्डेय की कविता-
‘रोटी और संसद’  में देश की राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य किया गया है। राजनीतिक व्यवस्था जनता की रोटी से खेलती है। रोटी जीने की प्राथमिक ज़रूरत है। गंदी राजनीति जनता की इस मूलभूत ज़रूरत को भी नजरंदाज करती है। 





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