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शुक्रवार, 12 जून 2009

'बदल रही हैं बेटियाँ' लेकिन बदलाव अभी बाकी है ?


महिला-महिला-महिला हर तरफ़ बस आजकल यही शोर हो रहा है, और हो भी क्यों न महिलाओं ने जो अबतक न किया था वो इस बार के लोक सभा चुनावों में सबसे ज़्यादा 59 सीटों पर कब्ज़ा जमाकर कर लिया, इसी के साथ एक बार फिर महिलाओं के लिए एक गर्व करने वाला क्षण आया जबकि मीरा कुमार को सर्व-सम्मति से भारत की 15 वीं लोकसभा की प्रथम महिला अध्यक्ष चुन लिया गया, और ये क्षण हमेशा के लिए यादगार बन गया। वैसे अब से पहले भी भारतीय महिलायें कई महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हो कर अपनी नेतृत्व क्षमता का परिचय दे चुकी हैं लेकिन क्या महिलों का स्तर हमारे आज के मौजूदा समाज मैं बदल रहा है? यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, क्योंकि केवल कुछ महत्त्व के पदों पर महिलाओं को बैठाने भर से सम्पूर्ण महिला वर्ग का विकास हो रहा है यह मानलेना गलत है। जब तक के महिलाओं के लिए, उनके अधिकारों के लिए तथा उनके विकास के लिए, सही प्रकार के रास्ते नही बनाये जायेंगे और सबसे बड़ी बात हमारे पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के बारे में सोच को सकारात्मक नहीं बनाया जायेगा । तब तक महिलाओं का स्तर नहीं बदल सकता, क्योंकि हमारे समाज में प्राचीन काल से पुरुष को ही प्राथमिकता का ताज पहनाया जाता रहा है और स्त्रियों में निवेश को घाटे का सौदा माना जाता रहा है। लेकिन वैश्वीकरण के इस युग में परिस्थितियां बदल रहीं हैं और हमारे यहाँ आज कह सकते हैं की 'बदल रही हैं बेटियाँ ' आज के दौर की बेटियाँ बदल गयी हैं, कहीं वो अपने माता -पिता के अधूरे सपने को पूरा कर रही हैं तो कहीं बुढापे में उनका संबल हैं . इस बदलाव के पीछे एक बड़ा कारक आर्थिक स्वतंत्रता का है। सामाजिक बदलाव की आंधी ने बेटियों को पढने -लिखने पर मजबूर किया था . माँ-बाप सोचते थे की अच्छी जगह शादी करने के लिए बेटी का पढ़ना जरुरी है और यही बदलाव आज उनका सहारा बन रहा है . जी हाँ बदलाव तो हो रहा है और हर स्तर पर हो रहा है जरा टीवी ही तो खोल कर देखिये हर चैनल आपको सामाजिक बदलाव में कुछ भागीदारी करता नज़र आजायेगा. भई हर चैनल आजकल महिला प्रधान तथा समाजिक मुद्दों की प्रष्टभूमि वाले धारावाहिक ही प्रस्तुत कर रहा है, भले ही इसमें बाजार का दबाव हो और बाजार ने ही इसका रूप निर्धारित किया हो. इतने बड़े माध्यम से समाज में कुछ तो चेतना जागृत होगी ही. चलिए यह तो रही बदलाव की बात जो की हमें दिख रहा है के हो रहा है. लेकिन कुछ बदलाव आज भी होने हैं जो की हमारे लिए बहुत जरुरी हैं, कहीं एक नर्सिंग होम के बाहर लिखा देखा -'Here Pre-Natal Sex Determination (Boy or Girl Before Birth ) Is Not Done, It is A Punishable Act.' तो मन में सवाल उठा क्या जैसा बाहर लिखा है वैसा ही अन्दर होता है? क्योंकि जिस भ्रूण हत्या अपराध के लिए अधिकांशतः ग्रामीण, अनपढ़ एवं निचले तपके के लोगो को दोषी ठहराया जाता रहा है आज वही भ्रूण हत्या की अपराधवृति हमारे शहरी समाज में दिनोंदिन तेजी से बढती जा रही है, जिसमें इन्ही छोटे-छोटे नर्सिंग होमो की भूमिका अहम बनी हुई है. और ये यह भी दर्शाता है की हमारे शहरी संभ्रांत परिवार ऊपर से तो पढ़े-लिखे नज़र आते हैं किन्तु भीतर से वही पुरानी मैली कुचैली संकीर्णता अपने अन्दर आज भी समाये हुए हैं . भ्रूण हत्या एक जघन्य अपराध है इसके चलते हमारा विकास संभव नहीं है क्योंकि हमारा समाज तेजी से स्त्रीविहीनता की ओर बढ़ रहा है, कन्या की पूजा में देवी का वास देखने वाला हमारा भारतीय समाज स्वयं अपनी देवी यानी की कन्याओं को निगलता जा रहा है । ज़रा सोचिये अगर नवरात्रों के समय जिमाने के लिए चलती फिरती कन्याओं के स्थान पर गुडियों या मूर्तियों का सहारा लेना पड़े अथवा कुछ वर्षों बाद एक संघर्ष उत्पन्न हो जब कन्या एक और ६ वर हों ! तब विवाह ही एक संघर्ष का रूप बनकर समाज में व्याप्त हो जाएगा । यदि कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला इसी रफ़्तार से चलता रहा तो स्रष्टि की सूत्रधार नारी ही नही बचेगी और फ़िर जीवन चक्र का पहियाँ अपनी धुरी पर चलेगा कैसे ?

मंगलवार, 2 जून 2009

धर्म की दुकान !


धर्म की दुकान!

पढ़ाई पूरी कर चुका युवक जब नौकरी न पा सका। तो एक दिन थक-हार कर एक पहुंचे हुए संत के आश्रम में जा पहुँचा। संत को अपनी व्यथा सुनाई, तो संत ने उसे एक रास्ता बताया-

कि हे वत्स-

'घनी' आबादी वाले इलाके में मंदिर खोल लो,

'धर्म' को जीविका से जोड़ लो।

इतना कमाओगे कि संसार रूपी भवसागर में तर जाओगे।

संतरी से लेकर मंत्री तक सब आ कर शीश झुकाएंगे।

आशीर्वाद लेकर जायेंगे।

जनता तुम्हें अवतार समझ सर आँखों पर बिठाएगी।

कई कुंवारी अकुंवारी नारियां भी तुम्हारी शरण मैं आएँगी।

पुलिस वाले भी तुम से घबराएंगे, जब कमिशनर साहब खुद प्रसाद ले जायेंगे।

भला इतना सब कुछ किस धंधे, सर्विस में पाओगे?

देर न करो शुभकार्य में वरना फिर पछताओगे।
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