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बृहस्पतिवार, 26 जुलाई 2012

शासन की बंदूक !




शासन की बंदूक.....


खड़ी हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
उस हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
जिसमें कानी हो गई शासन की बंदूक
बढ़ी बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य वह, धन्य वह, शासन की बंदूक
सत्य स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ दगने लगी शासन की बंदूक
जली ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल न बाँका कर सकी शासन की बंदूक।

नागार्जुन की ‘शासन की बंदूक’ कविता में कवि व्यवस्था को चुनौती देता है। व्यवस्था बंदूक के बल पर  जनता पर शासन नहीं कर सकती है। जनता के प्रतिरोध के सामने बंदूक की ताकत नगण्य हो जाती है।

नागार्जुन की कविता में जनसामन्य का दुख दर्द और उल्लास है। उनकी कविता को पढ़कर यह अनुभव होता है कि लोकजीवन और प्रकृति के बीच एक अटूट संबंध है। इस प्रकृति में रूप ‘रस’, ‘राग’ के साथ ‘विद्रोह’ भी है। आमानवीय व्यवस्था के प्रति उनमें आक्रोश है और उन्हें जन सामान्य की सामूहिक शक्ति में विश्वास है। ‘शासन की बंदूक’ कविता में वे इस विचार को अभिव्यंजित करते हैं। 

मंगलवार, 24 जुलाई 2012

कमरा खाली है........और बत्ती जल रही है।



कमरा खाली है
और बत्ती जल रही है।
कीडे़-मकोडे़ कहीं नहीं दीखते।
फिर भी दीवार पर एक छिपकली चल रही है।
सेज पर फूलों का गुलदस्ता है
ताजा और रंगीन ।
वह कुछ बोलना चाहता है।
फुलवारी में सारे राज
आशकार ( प्रकट ) नहीं हुए।
वह कमरे में भी कोई भेद
खोलना चाहता है?
लेकिन वह कौन है।
उसकी बात सुनने वाला कौन है।
कमरा खाली है!
और बत्ती जल रही है।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता, कमरा खाली है …  में घर का बिंब है।
कमरा खाली है, कविता में कवि काव्यानुभूति की रिक्तता को अभिव्यक्त करता है। यह कमरा कवि का हृदय है, लेकिन वह खाली है। हृदय में प्रेम की अनुभूति है लेकिन वह प्रकट नहीं हो रही है।

मंगलवार, 19 जून 2012

रोटी और संसद














रोटी और संसद

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है।
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है।
वह रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ –
‘यह तीसरा आदमी कौन है ?’
मेरे देश की संसद मौन है।

हिन्दी साहित्य में धूमिल के नाम से प्रसिद्ध कवि सुदामा पाण्डेय की कविता-
‘रोटी और संसद’  में देश की राजनीतिक व्यवस्था पर व्यंग्य किया गया है। राजनीतिक व्यवस्था जनता की रोटी से खेलती है। रोटी जीने की प्राथमिक ज़रूरत है। गंदी राजनीति जनता की इस मूलभूत ज़रूरत को भी नजरंदाज करती है। 





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