शासन
की बंदूक.....
खड़ी
हो गई चाँपकर कंकालों की हूक
नभ
में विपुल विराट-सी शासन की बंदूक
उस
हिटलरी गुमान पर सभी रहे हैं थूक
जिसमें
कानी हो गई शासन की बंदूक
बढ़ी
बधिरता दसगुनी, बने विनोबा मूक
धन्य-धन्य
वह, धन्य वह, शासन की बंदूक
सत्य
स्वयं घायल हुआ, गई अहिंसा चूक
जहाँ-तहाँ
दगने लगी शासन की बंदूक
जली
ठूँठ पर बैठकर गई कोकिला कूक
बाल
न बाँका कर सकी शासन की बंदूक।
नागार्जुन
की ‘शासन की बंदूक’ कविता में कवि व्यवस्था को चुनौती देता है। व्यवस्था बंदूक के बल
पर जनता पर शासन नहीं कर सकती है। जनता के
प्रतिरोध के सामने बंदूक की ताकत नगण्य हो जाती है।
नागार्जुन
की कविता में जनसामन्य का दुख दर्द और उल्लास है। उनकी कविता को पढ़कर यह अनुभव होता
है कि लोकजीवन और प्रकृति के बीच एक अटूट संबंध है। इस प्रकृति में रूप ‘रस’, ‘राग’
के साथ ‘विद्रोह’ भी है। आमानवीय व्यवस्था के प्रति उनमें आक्रोश है और उन्हें जन सामान्य
की सामूहिक शक्ति में विश्वास है। ‘शासन की बंदूक’ कविता में वे इस विचार को अभिव्यंजित
करते हैं।


